मेरे बारे में

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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

गुरुवार, जनवरी 14, 2010

प्रेम - 1


जब स्कूल में पढ़ता था, तो हर वक्त शरारत सवार रहती थी... लेकिन कभी-कभी गंभीर भी हो जाया करता था, उस दिन या कई दिनों तक कोई शरारत नहीं... दोस्त पूछा करते थे कि अचानक क्या हो गया... हालाँकि उस वक्त तो मैने किसी से कुछ नहीं कहा... लेकिन आज अचानक मन हुआ कि खोल दूँ राज अपनी उदासी का...
जब तन्हाई में
गूँजे कोई आवाज़
बंद आँखें देखने लगें
कोई तस्वीर
कोई वजूद छाया-सा लगे
दिलों-दिमाग पर
और शिद्दत से महसूस हो
अपने दिल की धड़कन…
उस वक्त जो गुदगुदाता है
शायद
उसी अहसास को कहते हैं
प्रेम...!

प्रेम - 2

अपने स्कूल के दिनों में कभी-कभी रूमानी हो जाता था... कई बार तो दोस्तों के किस्से भी काफी होते थे... उदास कर जाने के लिए... सालों पहले की रूमानियत बाँट रहा हूँ अब....

तुम्हारे साथ बिताया
हर लम्हा
ठहर जाता है मेरे पास
सौगात की तरह...
तन्हाई में घिर जाता है
मेरा वजूद
तुम्हारी यादों से...
और
काया और मन देर तक झूमते हैं
स्मृति की तरंगों पर...
रोज़ ही चलता है
ये सिलसिला
तुम्हारे आने से पहले
और
तुम्हारे चले जाने के बाद...

प्रेम - 3

जैसा कि पहले लिख चुका हूँ - ये अनगढ़ सी लाइनें उस वक्त की हैं, जब स्कूल में पढ़ा करता था... कस्बे में रहते हुए सामाजिक बंधनों को न स्वीकारते हुए भी मानना पड़ता है... बस उसी दौरान जो लगा... उतार दिया कागज़ पर... अरसे बाद वो पुर्ज़ा हाथ आया... तो पुराना वक्त याद आ गया...

अक्सर अपने घर के अंदर
मैं मिलता हूँ मज़बूरी से
जब चाहता हूँ तुमसे
मिलना पल भर के लिए
तब अचानक अनपेक्षित से लगते हैं
घर के सारे लोग
और मैं छिपते-छिपाते
तुम्हें देखकर ही संतुष्ट हो जाता हूँ
हर बार सोचता हूँ
कि तुम्हें बुला लूँगा अपने पास हमेशा के लिए
पर तुमसे एक ही मुलाकात
भुला देती है सारी मुश्किलें
जब तक कि मैं फिर से मज़बूर नहीं होता
और
समझौता नहीं करता मज़बूरी से...!

तुम ख़ामोश हो... हमेशा की तरह...!

पिता, भाई, बेटा या पति
सिर्फ नाते बदले
नियति नहीं
तुम आश्रित थीं, आश्रित ही रहीं
कभी सहयोग, कभी सुरक्षा के नाम पर...

तुमने बाँटा निर्मल स्नेह
सबने चाही केवल देह
तुम शोषित थीं, शोषित ही रहीं
कभी जिम्मेदारी, कभी विवशता के नाम पर...

सबने छला है तुम्हें
हर दिन-हर पल
पर तुम्हें शिकायत नहीं
शायद स्वीकार लिया है तुमने इस छल को
हमेशा की तरह
कभी नियति, कभी महानता के नाम पर...!

नया साल...!


बढ़ गया आधी रात के बाद
एक और सामान
रद्दी की टोकरी में पड़े
दूसरे सामानों की तरह
लोगों ने उसे मिलेनियम कचरा कहा
और टाँग दिया
घर के दरवाज़े पर
अब कचरा सड़ रहा है
सड़ांध पहुँच चुकी है नथुनों के भीतर
पर लोग बेहद खुश हैं
उसे मिलेनियम गंध मानकर...!

सोमवार, दिसंबर 28, 2009

जाने किसकी नज़्म है ये... पर बेहद ख़ूबसूरत है....

मुझको मेरे ही खेत में धरती उतार दे
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे

पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे

तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे

खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...

हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...

गुरुवार, अगस्त 20, 2009

भोजन से पहले मंत्र ज़रूरी....!

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मंत्र पढ़ने के बाद ही मिलेगा खाना... ऐसा इसलिये, क्योंकि राज्य सरकार ने प्रदेश भर के सरकारी स्कूलों में बँटने वाले मिड डे मील से पहले भोजन बच्चों से भोजन मंत्र का पाठ कराने के आदेश दिये हैं... सरकार का आदेश लागू हो पाता... इससे पहले ही स्कूलों में मंत्रोच्चारण की खिलाफत शुरु हो गई... विवाद पर चर्चा से पहले एक नज़र उस मंत्र पर, जिसे सरकार बच्चों से पढ़ाना चाहती है -
"अन्न ग्रहण करने से पहले विचार मन में करना है
किस हेतु से इस शरीर का रक्षण, पोषण करना है
हे परमेश्वर एक प्रार्थना नित्य तुम्हारे चरणों में
लग जाए तन-मन-धन मेरा मातृभूमि की सेवा में"
यह भोजन मंत्र मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में सितम्बर से शुरू हो जाएगा, इसके लिए शिक्षकों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण देंगे... सूबे की भाजपा सरकार का स्कूलों में नई परम्पराएं शुरू करने का यह दूसरा बड़ा फैसला है, इससे पहले स्कूलों में सूर्य नमस्कार की शुरूआत हो चुकी है... भोजन से पहले मंत्र योजना लागू करने वाले स्कूल शिक्षा विभाग की मुखिया का तर्क है कि इसमें ईश्वर के प्रति धन्यवाद का भाव है, जिसने हमें अन्न दिया है... मंत्र में ये कामना भी की गई है कि अन्न खाकर और ज्ञान अर्जित कर हम इस योग्य बनें कि देश के काम आ सकें... इसके साथ ही यह मंत्र हिन्दी में है और समझने में आसान है... लेकिन मुस्लिम समुदाय के धर्मगुरुओं का कहना है कि सरकारी आदेश मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों के खिलाफ है... मुसलमान भोजन से पहले बिसमिल्लाह की चर्चा करते हैं इसलिए ऐसे भोजन मंत्र का कोई औचित्य नहीं है... अब बात कुछ सवालों पर... जो भोजन मंत्र पर उठे विवाद के बीच गुम हो गये हैं... भोजन करने से पहले ईश्वर को याद करने की परंपरा हर धर्म और समुदाय में रही है, लेकिन जब यही काम भाजपा सरकार करती है और एक प्रार्थना को मन्त्र का रूप दिया जाता है, तो बवाल शुरु हो जाता है... दरअसल धर्म और समुदाय में ही नहीं, तमाम मंहगे निजी स्कूलों में भी सालों से भोजन मंत्र किसी न किसी रूप में मौजूद है... लेकिन अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाने वालों ने कभी इस पर आपत्ति जताने की हिम्मत नहीं दिखाई... लेकिन जब राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों को भोजन मंत्र की परिधि में लाने का ऐलान किया, बस तभी से कुछ लोग झंडा उठाकर आगे आने को बेताब हो गये हैं... अरे भई, अगर हिम्मत है, तो पहले अपने बच्चों के निजी स्कूल में जाकर मॉर्निंग प्रेयर से लेकर फैंसी ड्रैस तक एक भी चीज की खिलाफत करके दिखाएँ... अगले दिन बच्चे की टीसी हाथ में आ जायेगी...
एक सवाल भोजन मंत्र लागू करने वाली राज्य सरकार से भी है, क्या सिर्फ भोजन मंत्र पढ़वा देने भर से मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता सुधर जायेगी... या फिर मिड डे मील में अक्सर निकलने वाले मेंढक, छिपकली और कीड़ों से निजात मिल जायेगी... ज़रूरत इस बात की है कि अगर भोजन से पहले मंत्र पढ़ाया जा रहा है, तो भोजन भी उतना ही शुद्द रखा जाये... उम्मीद की जाती है मन की शुचिता का दावा करने वाली सरकार को भोजन की शुद्दता का भी खयाल रहेगा...!

मंगलवार, अगस्त 04, 2009

मीडिया और मंदी - 2

धराशायी होते सदियों पुराने औद्योगिक घराने... सिमटती नौकरियाँ... बढ़ती बेरोज़गारी.... और ऐसा ही बहुत कुछ अख़बार के पन्नों और टेलीविज़न की स्क्रीन से हर दिन झाँकता दिखाई देता है... हर दिन बाज़ार के आँकड़े ये दिखाने के लिए चले आते हैं... कि हमारी-आपकी मुस्करहाट पर भी नज़र आना चाहिए मंदी का ग्रहण... लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि लगातार डराने वाली आर्थिक मंदी ने कुछ धन्नासेठों को मनमानी करने की छूट भी दे दी है... और इसका शिकार बने मंदी की खबर फाइल करने वाले ख़बरची... मंदी के बहाने मीडिया घरानों के मैनेजमैंट गुरुओं ने पुराने और मंझे हुए पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया... तो ऊँची पगार वाले मैनेजिंग पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह बचाये रखने के लिए छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया... कहीं पगार में कटौती हुई... कहीं ज़रूरी खर्चों के लिए तरसाया गया... तो कहीं ये तक कहा गया कि अपनी तनख्वाह खुद निकालो... ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या दर्जनों में है, जहाँ महीनों से पत्रकारों को तनख्वाह नहीं मिली है... कुछ दलाल किस्म के जर्नलिस्ट को छोड़ दें... तो कलम और कैमरे के ज़रिये सच को सामने लाने वाले पत्रकारों की मुश्किल ये है कि ज़िंदगी भर में कमाया हुनर, एक झटके में बेकार साबित होने के बाद यकीन करें भी तो किस पर... ऊपर से बेचारगी देखिये कि हर नाइंसाफी के खिलाफ ताल ठोंकने वाले पत्रकार अपना दुःख बयान तक नहीं कर सकते... खुलकर बगावत करने की तो छोड़िये... अपनी ही बिरादरी में भी हालात छिपाने को मजबूर हैं... ये कड़वी हकीकत आपके सामने इसलिये... ताकि किसी पत्रकार से सामना होने पर ये खयाल रहे कि बेहद बुरे वक्त का पूरे जीवट से सामना करता आदमी... आपकी दया का नहीं, बल्कि ज्यादा सम्मान का हकदार है....!

रविवार, अप्रैल 12, 2009

मीडिया और मंदी...

दुनिया भर में छाई मंदी का असर हर तरह के कारोबार पर पड़ा, तो इसकी डरावनी तस्वीर दुनिया तक पहुँचाने वाला मीडिया भी मंदी की मार से बच नहीं पाया... लेकिन दूसरे धंधों के उलट मीडिया का कारोबार बंद नहीं हुआ... बल्कि बुद्धि चातुर्य का कौतुक दिखाकर लोगों को बाँधने में माहिर मीडिया के महारथियों ने धन उगाही के नये तरीके ईजाद कर लिये... कैसे...?... पढ़िये इसी ब्लॉग पर...

शनिवार, फ़रवरी 14, 2009

ये कैसा आई लव यू ?

प्रचार की भूख ने प्यार के इज़हार को भी नहीं बख्शा... और भोपाल में कुछ लोगों ने मनवा दिया कुत्तों का वैलेंटाइन डे... गले में आई लव यू का बड़ा सा पोस्टर लटकाये कुत्ते भौंकते रहे... और इस तरह हुआ प्यार का इज़हार... कुत्तों को प्रेम का संदेश समझ में आया हो या नहीं... लेकिन इस नुमाइश के ज़रिये पब्लिसिटी पाने की हसरत ज़रूर पूरी हो गई...

वैलेंटाइन डे पर प्यार के इज़हार की खिलाफत के लिए कुछ लोग खड़े हुए... तो प्रेमियों की हिमायत करने भी कई लोग मैदान में आ गये... अख़बारों की सुर्खियों में इन्हें जगह मिली... तो टीवी के कैमरे भी इनके आगे-पीछे घूमते रहे... वैलेंटाइन के नाम पर पब्लिसिटी बटोरने वालों का न प्यार से वास्ता रहा... और न प्रेमियों से... इस दौर में जबकि प्यार आँखों की बजाय... ग्रीटिंग कार्ड और मोबाइल के मैसेज से बयाँ हो रहा है... तो पब्लिसिटी बटोरने वाले भला तमाशा दिखाने से पीछे क्यों रहते... और इन लोगों ने इंसान की ज़िंदगी का मकसद बन जाने वाले प्यार को... कुत्तों के हवाले कर दिया... कुत्ता अपनी प्रेमिका को कह रहा था आई लव यू... और सिर्फ कह नहीं रहा था... उसे दिखा भी रहा था... लेकिन इसमें कसूर कुत्ते का भी नहीं... उस बेचारे को तो ये भी नहीं मालूम... कि जिस मालिक के इशारे पर वो दुम हिलाता है... उसीने ये तमाशा खड़ा किया... वैलेंटाइन का बोझ गले में लटकाये बेचारे कुत्ते... शायद नहीं जानते होंगे कि इंसानों को प्यार के इज़हार के लिए... चीखने की ज़रुरत पड़ने लगी है... क्योंकि अब आँखों की जुबान समझी नहीं जाती... और दिल की आवाज़ सुनाई नहीं देती... इसीलिये खड़ी करनी पड़ती हैं नुमाइशें... और गली-गली में होते हैं प्रेम के तमाशे... प्यार के इज़हार के दिन इन तमाशबीनों से हम तो बस इतना ही कहेंगे... कि हो सके तो प्यार को प्यार ही रहने दो... इसे जबरन कोई नाम न दो...