भीड़ से
बचने की चाहत लिए
सपने में बस गई है
अपनी अलग दुनिया
हर रात
उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और
गुदगुदाता है सुबह तक
सब कुछ
सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब कुछ रौंदते हुए
और नींद के साथ
टूट जाता है
मेरा सपना भी...!
मेरे बारे में
- नीरज श्रीवास्तव
- लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
- अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.
शनिवार, जनवरी 23, 2010
शनिवार, जनवरी 16, 2010
अंधेरा
दिन भर
ईंट-गारे के बोझ तले
दबी चिंताएँ
अचानक मुखर हो उठती हैं
अंधेरे में...
अंधेरे में ही बचाती है माँ
अपने हिस्से की रोटी
सुबह के नाश्ते के लिए...
अंधेरी में ही माँगते हैं लाचार पिता
माँ की चूड़ियाँ
बेटे की फीस के लिए...
अंधेरे में ही
दुआ माँगती है बहन
भाई की नौकरी के लिए...
और अंधेरे में ही माँगता है भाई
ईश्वर से एक रिश्ता
अपनी बहन के लिए...
अजीब... लेकिन सच...
ज़रूरी है अंधेरा
रिश्तों की गर्माहट के लिए...!
ईंट-गारे के बोझ तले
दबी चिंताएँ
अचानक मुखर हो उठती हैं
अंधेरे में...
अंधेरे में ही बचाती है माँ
अपने हिस्से की रोटी
सुबह के नाश्ते के लिए...
अंधेरी में ही माँगते हैं लाचार पिता
माँ की चूड़ियाँ
बेटे की फीस के लिए...
अंधेरे में ही
दुआ माँगती है बहन
भाई की नौकरी के लिए...
और अंधेरे में ही माँगता है भाई
ईश्वर से एक रिश्ता
अपनी बहन के लिए...
अजीब... लेकिन सच...
ज़रूरी है अंधेरा
रिश्तों की गर्माहट के लिए...!
गुरुवार, जनवरी 14, 2010
प्रेम - 1

जब स्कूल में पढ़ता था, तो हर वक्त शरारत सवार रहती थी... लेकिन कभी-कभी गंभीर भी हो जाया करता था, उस दिन या कई दिनों तक कोई शरारत नहीं... दोस्त पूछा करते थे कि अचानक क्या हो गया... हालाँकि उस वक्त तो मैने किसी से कुछ नहीं कहा... लेकिन आज अचानक मन हुआ कि खोल दूँ राज अपनी उदासी का...
जब तन्हाई में
गूँजे कोई आवाज़
बंद आँखें देखने लगें
कोई तस्वीर
कोई वजूद छाया-सा लगे
दिलों-दिमाग पर
और शिद्दत से महसूस हो
अपने दिल की धड़कन…
उस वक्त जो गुदगुदाता है
शायद
उसी अहसास को कहते हैं
प्रेम...!
गूँजे कोई आवाज़
बंद आँखें देखने लगें
कोई तस्वीर
कोई वजूद छाया-सा लगे
दिलों-दिमाग पर
और शिद्दत से महसूस हो
अपने दिल की धड़कन…
उस वक्त जो गुदगुदाता है
शायद
उसी अहसास को कहते हैं
प्रेम...!
प्रेम - 2
अपने स्कूल के दिनों में कभी-कभी रूमानी हो जाता था... कई बार तो दोस्तों के किस्से भी काफी होते थे... उदास कर जाने के लिए... सालों पहले की रूमानियत बाँट रहा हूँ अब....
तुम्हारे साथ बिताया
हर लम्हा
ठहर जाता है मेरे पास
सौगात की तरह...
तन्हाई में घिर जाता है
मेरा वजूद
तुम्हारी यादों से...
और
काया और मन देर तक झूमते हैं
स्मृति की तरंगों पर...
रोज़ ही चलता है
ये सिलसिला
तुम्हारे आने से पहले
और
तुम्हारे चले जाने के बाद...
तुम्हारे साथ बिताया
हर लम्हा
ठहर जाता है मेरे पास
सौगात की तरह...
तन्हाई में घिर जाता है
मेरा वजूद
तुम्हारी यादों से...
और
काया और मन देर तक झूमते हैं
स्मृति की तरंगों पर...
रोज़ ही चलता है
ये सिलसिला
तुम्हारे आने से पहले
और
तुम्हारे चले जाने के बाद...
प्रेम - 3
जैसा कि पहले लिख चुका हूँ - ये अनगढ़ सी लाइनें उस वक्त की हैं, जब स्कूल में पढ़ा करता था... कस्बे में रहते हुए सामाजिक बंधनों को न स्वीकारते हुए भी मानना पड़ता है... बस उसी दौरान जो लगा... उतार दिया कागज़ पर... अरसे बाद वो पुर्ज़ा हाथ आया... तो पुराना वक्त याद आ गया...
अक्सर अपने घर के अंदर
मैं मिलता हूँ मज़बूरी से
जब चाहता हूँ तुमसे
मिलना पल भर के लिए
तब अचानक अनपेक्षित से लगते हैं
घर के सारे लोग
और मैं छिपते-छिपाते
तुम्हें देखकर ही संतुष्ट हो जाता हूँ
हर बार सोचता हूँ
कि तुम्हें बुला लूँगा अपने पास हमेशा के लिए
पर तुमसे एक ही मुलाकात
भुला देती है सारी मुश्किलें
जब तक कि मैं फिर से मज़बूर नहीं होता
और
समझौता नहीं करता मज़बूरी से...!
अक्सर अपने घर के अंदर
मैं मिलता हूँ मज़बूरी से
जब चाहता हूँ तुमसे
मिलना पल भर के लिए
तब अचानक अनपेक्षित से लगते हैं
घर के सारे लोग
और मैं छिपते-छिपाते
तुम्हें देखकर ही संतुष्ट हो जाता हूँ
हर बार सोचता हूँ
कि तुम्हें बुला लूँगा अपने पास हमेशा के लिए
पर तुमसे एक ही मुलाकात
भुला देती है सारी मुश्किलें
जब तक कि मैं फिर से मज़बूर नहीं होता
और
समझौता नहीं करता मज़बूरी से...!
तुम ख़ामोश हो... हमेशा की तरह...!
पिता, भाई, बेटा या पतिसिर्फ नाते बदले
नियति नहीं
तुम आश्रित थीं, आश्रित ही रहीं
कभी सहयोग, कभी सुरक्षा के नाम पर...
तुमने बाँटा निर्मल स्नेह
सबने चाही केवल देह
तुम शोषित थीं, शोषित ही रहीं
कभी जिम्मेदारी, कभी विवशता के नाम पर...
सबने छला है तुम्हें
हर दिन-हर पल
पर तुम्हें शिकायत नहीं
शायद स्वीकार लिया है तुमने इस छल को
हमेशा की तरह
कभी नियति, कभी महानता के नाम पर...!
नया साल...!
सोमवार, दिसंबर 28, 2009
जाने किसकी नज़्म है ये... पर बेहद ख़ूबसूरत है....
मुझको मेरे ही खेत में धरती उतार दे
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे
पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे
तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे
खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...
हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे
पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे
तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे
खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...
हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...
गुरुवार, अगस्त 20, 2009
भोजन से पहले मंत्र ज़रूरी....!
मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मंत्र पढ़ने के बाद ही मिलेगा खाना... ऐसा इसलिये, क्योंकि राज्य सरकार ने प्रदेश भर के सरकारी स्कूलों में बँटने वाले मिड डे मील से पहले भोजन बच्चों से भोजन मंत्र का पाठ कराने के आदेश दिये हैं... सरकार का आदेश लागू हो पाता... इससे पहले ही स्कूलों में मंत्रोच्चारण की खिलाफत शुरु हो गई... विवाद पर चर्चा से पहले एक नज़र उस मंत्र पर, जिसे सरकार बच्चों से पढ़ाना चाहती है -"अन्न ग्रहण करने से पहले विचार मन में करना है
किस हेतु से इस शरीर का रक्षण, पोषण करना है
हे परमेश्वर एक प्रार्थना नित्य तुम्हारे चरणों में
लग जाए तन-मन-धन मेरा मातृभूमि की सेवा में"
यह भोजन मंत्र मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में सितम्बर से शुरू हो जाएगा, इसके लिए शिक्षकों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण देंगे... सूबे की भाजपा सरकार का स्कूलों में नई परम्पराएं शुरू करने का यह दूसरा बड़ा फैसला है, इससे पहले स्कूलों में सूर्य नमस्कार की शुरूआत हो चुकी है... भोजन से पहले मंत्र योजना लागू करने वाले स्कूल शिक्षा विभाग की मुखिया का तर्क है कि इसमें ईश्वर के प्रति धन्यवाद का भाव है, जिसने हमें अन्न दिया है... मंत्र में ये कामना भी की गई है कि अन्न खाकर और ज्ञान अर्जित कर हम इस योग्य बनें कि देश के काम आ सकें... इसके साथ ही यह मंत्र हिन्दी में है और समझने में आसान है... लेकिन मुस्लिम समुदाय के धर्मगुरुओं का कहना है कि सरकारी आदेश मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों के खिलाफ है... मुसलमान भोजन से पहले बिसमिल्लाह की चर्चा करते हैं इसलिए ऐसे भोजन मंत्र का कोई औचित्य नहीं है... अब बात कुछ सवालों पर... जो भोजन मंत्र पर उठे विवाद के बीच गुम हो गये हैं... भोजन करने से पहले ईश्वर को याद करने की परंपरा हर धर्म और समुदाय में रही है, लेकिन जब यही काम भाजपा सरकार करती है और एक प्रार्थना को मन्त्र का रूप दिया जाता है, तो बवाल शुरु हो जाता है... दरअसल धर्म और समुदाय में ही नहीं, तमाम मंहगे निजी स्कूलों में भी सालों से भोजन मंत्र किसी न किसी रूप में मौजूद है... लेकिन अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाने वालों ने कभी इस पर आपत्ति जताने की हिम्मत नहीं दिखाई... लेकिन जब राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों को भोजन मंत्र की परिधि में लाने का ऐलान किया, बस तभी से कुछ लोग झंडा उठाकर आगे आने को बेताब हो गये हैं... अरे भई, अगर हिम्मत है, तो पहले अपने बच्चों के निजी स्कूल में जाकर मॉर्निंग प्रेयर से लेकर फैंसी ड्रैस तक एक भी चीज की खिलाफत करके दिखाएँ... अगले दिन बच्चे की टीसी हाथ में आ जायेगी...
एक सवाल भोजन मंत्र लागू करने वाली राज्य सरकार से भी है, क्या सिर्फ भोजन मंत्र पढ़वा देने भर से मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता सुधर जायेगी... या फिर मिड डे मील में अक्सर निकलने वाले मेंढक, छिपकली और कीड़ों से निजात मिल जायेगी... ज़रूरत इस बात की है कि अगर भोजन से पहले मंत्र पढ़ाया जा रहा है, तो भोजन भी उतना ही शुद्द रखा जाये... उम्मीद की जाती है मन की शुचिता का दावा करने वाली सरकार को भोजन की शुद्दता का भी खयाल रहेगा...!
मंगलवार, अगस्त 04, 2009
मीडिया और मंदी - 2
धराशायी होते सदियों पुराने औद्योगिक घराने... सिमटती नौकरियाँ... बढ़ती बेरोज़गारी.... और ऐसा ही बहुत कुछ अख़बार के पन्नों और टेलीविज़न की स्क्रीन से हर दिन झाँकता दिखाई देता है... हर दिन बाज़ार के आँकड़े ये दिखाने के लिए चले आते हैं... कि हमारी-आपकी मुस्करहाट पर भी नज़र आना चाहिए मंदी का ग्रहण... लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि लगातार डराने वाली आर्थिक मंदी ने कुछ धन्नासेठों को मनमानी करने की छूट भी दे दी है... और इसका शिकार बने मंदी की खबर फाइल करने वाले ख़बरची... मंदी के बहाने मीडिया घरानों के मैनेजमैंट गुरुओं ने पुराने और मंझे हुए पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया... तो ऊँची पगार वाले मैनेजिंग पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह बचाये रखने के लिए छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया... कहीं पगार में कटौती हुई... कहीं ज़रूरी खर्चों के लिए तरसाया गया... तो कहीं ये तक कहा गया कि अपनी तनख्वाह खुद निकालो... ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या दर्जनों में है, जहाँ महीनों से पत्रकारों को तनख्वाह नहीं मिली है... कुछ दलाल किस्म के जर्नलिस्ट को छोड़ दें... तो कलम और कैमरे के ज़रिये सच को सामने लाने वाले पत्रकारों की मुश्किल ये है कि ज़िंदगी भर में कमाया हुनर, एक झटके में बेकार साबित होने के बाद यकीन करें भी तो किस पर... ऊपर से बेचारगी देखिये कि हर नाइंसाफी के खिलाफ ताल ठोंकने वाले पत्रकार अपना दुःख बयान तक नहीं कर सकते... खुलकर बगावत करने की तो छोड़िये... अपनी ही बिरादरी में भी हालात छिपाने को मजबूर हैं... ये कड़वी हकीकत आपके सामने इसलिये... ताकि किसी पत्रकार से सामना होने पर ये खयाल रहे कि बेहद बुरे वक्त का पूरे जीवट से सामना करता आदमी... आपकी दया का नहीं, बल्कि ज्यादा सम्मान का हकदार है....!
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