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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2010

क्या यही है ज़िंदगी...?

एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी ने कामकाजी लोगों के लिए... ज़िंदगी का फ़लसफा लिख भेजा था... पढ़कर लगा कि इसी राह में बढ़ चले हैं हम सब... शायद इसे पढ़कर याद आये... ज़िंदगी की भागमभाग में क्या कुछ छूट रहा है हमसे...


शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?
पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है, भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?
सीरियल्स के किरदारों का सारा हाल है मालूम, पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?
इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं, लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.
मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है, लेकिन जिगरी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?
108 हैं चैनल फ़िर भी दिल बहलते क्यूं नहीं?
अब रेत पर नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?
कब डूबते हुए सूरज को देखा था, याद है?
कब जाना था, शाम का गुज़रना क्या है?
तो दोस्तो...! शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है, तो फ़िर मरना क्या हैं?

शनिवार, जनवरी 23, 2010

सपना...

भीड़ से
बचने की चाहत लिए
सपने में बस गई है
अपनी अलग दुनिया
हर रात
उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और
गुदगुदाता है सुबह तक
सब कुछ
सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब कुछ रौंदते हुए
और नींद के साथ
टूट जाता है
मेरा सपना भी...!

शनिवार, जनवरी 16, 2010

अंधेरा

दिन भर
ईंट-गारे के बोझ तले
दबी चिंताएँ
अचानक मुखर हो उठती हैं
अंधेरे में...

अंधेरे में ही बचाती है माँ
अपने हिस्से की रोटी
सुबह के नाश्ते के लिए...

अंधेरी में ही माँगते हैं लाचार पिता
माँ की चूड़ियाँ
बेटे की फीस के लिए...

अंधेरे में ही
दुआ माँगती है बहन
भाई की नौकरी के लिए...

और अंधेरे में ही माँगता है भाई
ईश्वर से एक रिश्ता
अपनी बहन के लिए...

अजीब... लेकिन सच...
ज़रूरी है अंधेरा
रिश्तों की गर्माहट के लिए...!

गुरुवार, जनवरी 14, 2010

प्रेम - 1


जब स्कूल में पढ़ता था, तो हर वक्त शरारत सवार रहती थी... लेकिन कभी-कभी गंभीर भी हो जाया करता था, उस दिन या कई दिनों तक कोई शरारत नहीं... दोस्त पूछा करते थे कि अचानक क्या हो गया... हालाँकि उस वक्त तो मैने किसी से कुछ नहीं कहा... लेकिन आज अचानक मन हुआ कि खोल दूँ राज अपनी उदासी का...
जब तन्हाई में
गूँजे कोई आवाज़
बंद आँखें देखने लगें
कोई तस्वीर
कोई वजूद छाया-सा लगे
दिलों-दिमाग पर
और शिद्दत से महसूस हो
अपने दिल की धड़कन…
उस वक्त जो गुदगुदाता है
शायद
उसी अहसास को कहते हैं
प्रेम...!

प्रेम - 2

अपने स्कूल के दिनों में कभी-कभी रूमानी हो जाता था... कई बार तो दोस्तों के किस्से भी काफी होते थे... उदास कर जाने के लिए... सालों पहले की रूमानियत बाँट रहा हूँ अब....

तुम्हारे साथ बिताया
हर लम्हा
ठहर जाता है मेरे पास
सौगात की तरह...
तन्हाई में घिर जाता है
मेरा वजूद
तुम्हारी यादों से...
और
काया और मन देर तक झूमते हैं
स्मृति की तरंगों पर...
रोज़ ही चलता है
ये सिलसिला
तुम्हारे आने से पहले
और
तुम्हारे चले जाने के बाद...

प्रेम - 3

जैसा कि पहले लिख चुका हूँ - ये अनगढ़ सी लाइनें उस वक्त की हैं, जब स्कूल में पढ़ा करता था... कस्बे में रहते हुए सामाजिक बंधनों को न स्वीकारते हुए भी मानना पड़ता है... बस उसी दौरान जो लगा... उतार दिया कागज़ पर... अरसे बाद वो पुर्ज़ा हाथ आया... तो पुराना वक्त याद आ गया...

अक्सर अपने घर के अंदर
मैं मिलता हूँ मज़बूरी से
जब चाहता हूँ तुमसे
मिलना पल भर के लिए
तब अचानक अनपेक्षित से लगते हैं
घर के सारे लोग
और मैं छिपते-छिपाते
तुम्हें देखकर ही संतुष्ट हो जाता हूँ
हर बार सोचता हूँ
कि तुम्हें बुला लूँगा अपने पास हमेशा के लिए
पर तुमसे एक ही मुलाकात
भुला देती है सारी मुश्किलें
जब तक कि मैं फिर से मज़बूर नहीं होता
और
समझौता नहीं करता मज़बूरी से...!

तुम ख़ामोश हो... हमेशा की तरह...!

पिता, भाई, बेटा या पति
सिर्फ नाते बदले
नियति नहीं
तुम आश्रित थीं, आश्रित ही रहीं
कभी सहयोग, कभी सुरक्षा के नाम पर...

तुमने बाँटा निर्मल स्नेह
सबने चाही केवल देह
तुम शोषित थीं, शोषित ही रहीं
कभी जिम्मेदारी, कभी विवशता के नाम पर...

सबने छला है तुम्हें
हर दिन-हर पल
पर तुम्हें शिकायत नहीं
शायद स्वीकार लिया है तुमने इस छल को
हमेशा की तरह
कभी नियति, कभी महानता के नाम पर...!

नया साल...!


बढ़ गया आधी रात के बाद
एक और सामान
रद्दी की टोकरी में पड़े
दूसरे सामानों की तरह
लोगों ने उसे मिलेनियम कचरा कहा
और टाँग दिया
घर के दरवाज़े पर
अब कचरा सड़ रहा है
सड़ांध पहुँच चुकी है नथुनों के भीतर
पर लोग बेहद खुश हैं
उसे मिलेनियम गंध मानकर...!

सोमवार, दिसंबर 28, 2009

जाने किसकी नज़्म है ये... पर बेहद ख़ूबसूरत है....

मुझको मेरे ही खेत में धरती उतार दे
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे

पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे

तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे

खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...

हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...

गुरुवार, अगस्त 20, 2009

भोजन से पहले मंत्र ज़रूरी....!

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मंत्र पढ़ने के बाद ही मिलेगा खाना... ऐसा इसलिये, क्योंकि राज्य सरकार ने प्रदेश भर के सरकारी स्कूलों में बँटने वाले मिड डे मील से पहले भोजन बच्चों से भोजन मंत्र का पाठ कराने के आदेश दिये हैं... सरकार का आदेश लागू हो पाता... इससे पहले ही स्कूलों में मंत्रोच्चारण की खिलाफत शुरु हो गई... विवाद पर चर्चा से पहले एक नज़र उस मंत्र पर, जिसे सरकार बच्चों से पढ़ाना चाहती है -
"अन्न ग्रहण करने से पहले विचार मन में करना है
किस हेतु से इस शरीर का रक्षण, पोषण करना है
हे परमेश्वर एक प्रार्थना नित्य तुम्हारे चरणों में
लग जाए तन-मन-धन मेरा मातृभूमि की सेवा में"
यह भोजन मंत्र मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में सितम्बर से शुरू हो जाएगा, इसके लिए शिक्षकों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण देंगे... सूबे की भाजपा सरकार का स्कूलों में नई परम्पराएं शुरू करने का यह दूसरा बड़ा फैसला है, इससे पहले स्कूलों में सूर्य नमस्कार की शुरूआत हो चुकी है... भोजन से पहले मंत्र योजना लागू करने वाले स्कूल शिक्षा विभाग की मुखिया का तर्क है कि इसमें ईश्वर के प्रति धन्यवाद का भाव है, जिसने हमें अन्न दिया है... मंत्र में ये कामना भी की गई है कि अन्न खाकर और ज्ञान अर्जित कर हम इस योग्य बनें कि देश के काम आ सकें... इसके साथ ही यह मंत्र हिन्दी में है और समझने में आसान है... लेकिन मुस्लिम समुदाय के धर्मगुरुओं का कहना है कि सरकारी आदेश मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों के खिलाफ है... मुसलमान भोजन से पहले बिसमिल्लाह की चर्चा करते हैं इसलिए ऐसे भोजन मंत्र का कोई औचित्य नहीं है... अब बात कुछ सवालों पर... जो भोजन मंत्र पर उठे विवाद के बीच गुम हो गये हैं... भोजन करने से पहले ईश्वर को याद करने की परंपरा हर धर्म और समुदाय में रही है, लेकिन जब यही काम भाजपा सरकार करती है और एक प्रार्थना को मन्त्र का रूप दिया जाता है, तो बवाल शुरु हो जाता है... दरअसल धर्म और समुदाय में ही नहीं, तमाम मंहगे निजी स्कूलों में भी सालों से भोजन मंत्र किसी न किसी रूप में मौजूद है... लेकिन अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाने वालों ने कभी इस पर आपत्ति जताने की हिम्मत नहीं दिखाई... लेकिन जब राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों को भोजन मंत्र की परिधि में लाने का ऐलान किया, बस तभी से कुछ लोग झंडा उठाकर आगे आने को बेताब हो गये हैं... अरे भई, अगर हिम्मत है, तो पहले अपने बच्चों के निजी स्कूल में जाकर मॉर्निंग प्रेयर से लेकर फैंसी ड्रैस तक एक भी चीज की खिलाफत करके दिखाएँ... अगले दिन बच्चे की टीसी हाथ में आ जायेगी...
एक सवाल भोजन मंत्र लागू करने वाली राज्य सरकार से भी है, क्या सिर्फ भोजन मंत्र पढ़वा देने भर से मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता सुधर जायेगी... या फिर मिड डे मील में अक्सर निकलने वाले मेंढक, छिपकली और कीड़ों से निजात मिल जायेगी... ज़रूरत इस बात की है कि अगर भोजन से पहले मंत्र पढ़ाया जा रहा है, तो भोजन भी उतना ही शुद्द रखा जाये... उम्मीद की जाती है मन की शुचिता का दावा करने वाली सरकार को भोजन की शुद्दता का भी खयाल रहेगा...!