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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2010

क्या यही है ज़िंदगी...?

एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी ने कामकाजी लोगों के लिए... ज़िंदगी का फ़लसफा लिख भेजा था... पढ़कर लगा कि इसी राह में बढ़ चले हैं हम सब... शायद इसे पढ़कर याद आये... ज़िंदगी की भागमभाग में क्या कुछ छूट रहा है हमसे...


शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है?
पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है, भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है?
सीरियल्स के किरदारों का सारा हाल है मालूम, पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है?
इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं, लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं.
मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है, लेकिन जिगरी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं?
108 हैं चैनल फ़िर भी दिल बहलते क्यूं नहीं?
अब रेत पर नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं?
कब डूबते हुए सूरज को देखा था, याद है?
कब जाना था, शाम का गुज़रना क्या है?
तो दोस्तो...! शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है?
जब यही जीना है, तो फ़िर मरना क्या हैं?