मेरे बारे में

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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

शनिवार, नवंबर 29, 2008

क्या होगा धमाकों के बाद...?


मुंबई में आतंकी साजिश का शिकार हुए लोग तो चले गये... लेकिन उनके नाम पर अगले कुछ दिनों में बहुत कुछ देखने को मिलेगा... सड़क पर मार्च होगा, मोमबत्तियाँ जलाईं जायेंगी, कहीं सभा होगी, फिर एक दिन श्रद्धांजलि के नाम पर कोई म्यूज़िक या वीडियो लांच करने का ऐलान करेगा... हो सकता है एकाध फिल्म भी बन जाये, दहशत को भुनाने के लिए... बस यहीं तक जाती है राह हमारे दिखावे की... और सब-कुछ बिसरा दिया जाता है... दिल्ली हो, जयपुर, अहमदाबाद या मुंबई... जहाँ खून गिरा... बेहद कम वक्त बीतने के बाद वहीं शुरु हो जाता है रंगीनियों का तमाशा... क्या इतने सिमट गये हैं हमारे दायरे... कि खुद से आगे न नज़रे पहुँचती हैं... और न संवेदना !

गुनहगार ये भी...!

एक बार फिर दहली मुंबई... इस बार दहशतगर्दों का निशाना बनी ताज की वो इमारत... जिसका सेहन एक सदी से भी ज्यादा वक्त से दुनिया के सैलानियों को लुभाता रहा... लेकिन इस बार मौत ने उनकी मेजबानी की... सैकड़ों ज़िंदगियाँ लाशों में बदलीं... और बाकी को बचाने में जाँबाज काम आये... जाने वाले चले गये... लेकिन मौत के मंज़र को खेल बनाकर जिस तरह पर्दे पर पेश किया गया... वो भी धमाकों से कम ख़तरनाक नहीं था... इसमें भी जाने कितने पिताओं का दिल बैठा होगा... जाने कितनी माताओं का कलेजा मुँह को आया होगा... चाहरदीवारी के भीतर तक आतंक परोसने वालों को अपना गुनाह नज़र आता हो या नहीं... लेकिन खौफ़ के ये सौदागर अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते... एक दिन उन्हें जवाब देना होगा... और ये जवाब सफाई से नहीं साफगोई से दिया जाना चाहिए...

सोमवार, नवंबर 24, 2008

एक दुआ अपने लिए !

ये कहानी है उस रास्ते पर चलने की... जो मंज़िल की तरफ जाने से पहले ही ख़त्म हो गया... इस रास्ते ने सिर्फ मंज़िल की राह ही ख़त्म नहीं की... बल्कि उम्मीदों का काफिला भी रोक दिया... सपनों को कच्ची नींद में तोड़ दिया... और रात के अंधेरे में उस वक्त भटकने को छोड़ा... जब सुबह के आसार भी नज़र नहीं आते... क्या आप भी गुजर चुके हैं या गुजर रहे हैं किसी ऐसी ही राह से...ऐसी ही रात से गुज़र रहे हैं आप भी ,तो आइये मिलकर दुआ करें... कि सुबह भी जल्दी ही आये... क्या आप सबके साथ उम्मीद कर सकता हूँ... कि वो सुबह कभी तो आयेगी.....!

गुरुवार, नवंबर 13, 2008

दहलीज़

दोपहर के दो से चार बजे के बीच
घर की दहलीज पर
बैठी हैं दो महिलाएं...
थाली में पड़े चावल बीने जा रहे हैं
और साथ चल रही हैं बातें
सुख-दुःख की...

रोज़ की सब्ज़ी से लेकर
त्यौहार के व्यंजन तक
और
घर की बातों से लेकर
मंदिर के प्रवचन तक
सारे विषय उतर आते हैं
उनकी बातों में...

इनके दुःख साझे हैं
सुख भी साझे हैं
और साझा है
सपनों का संसार
कितने ख़ास हैं
दहलीज के सरोकार....

सोमवार, सितंबर 29, 2008

घर... !

खिड़की से सटे पलंग पर
मुँह बनाये लेटा है भाई...
परदे के पार
चूल्हे से जूझ रही है बहन...
घुटनों पर तेल मल रही है
बीमार माँ...
और माथे पर हाथ धरे
गहरी सोच में डूबे हैं पिता...

सबके पास अपनी परेशानियाँ हैं
अपने दुःख हैं...
और
अपना दुःख सबसे बड़ा होने की खीज भी

एक-दूसरे से लगभग अबोला है सबका
अजीब बात है -
दुःख भी साझे नहीं रहे
सुखों की तरह...

संवेदनाएँ... !

मृत देहों के चिथड़े
बिलखते हुए नवजात
और खून से सनकर
पहचान खो चुकी लाशें
यही सब दिखता है
समाचार की सुर्खियों में
मन करता है... चस्पा कर दूँ
एक सूचना भी...
कि यह सिर्फ विज्ञापन है
प्रायोजित संवेदनाओं का...!

पहचान !

आज कविता नहीं
कहानी सुनाता हूँ तुम्हें...

ये कहानी है
हम जैसे एक आदमी की
जो ईसाई नहीं था
क्योंकि तब इस देश में ये धर्म नहीं था
वो सिख भी नहीं था
क्योंकि तब ये धर्म जन्मा नहीं था
और
हिंदू या मुसलमान होना
उसे पसंद नहीं था

मज़हब के आइने से दुनिया देखने वालों
सोचकर बताओ ज़रा
इस आदमी की पहचान कैसे होगी...?

मेरा सपना !

भीड़ से बचने की चाहत लिये
अपनी अलग दुनिया
बस गई है सपने में...

हर रात उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और सुबह तक गुदगुदाता है
सब-कुछ सुहाना होने के अहसास से

अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब-कुछ रौंदते हुए
और
नींद के साथ टूट जाता है
मेरा सपना भी...!

बोलो कबीर !

एक अरसे से नहीं सुनी
आवाज़ तुम्हारी
आख़िर चुप क्यों हो कबीर...

मंदिर के घड़ियालों और
मुल्ला की अज़ानों के बीच
कहाँ खो गई है आवाज़ तुम्हारी
चुप क्यों हो कबीर...

एक-दूसरे से लड़ बैठे हैं
राम और रहीम
जख़्मों के बीच
सुबक रहा है एकेश्वर
चुप क्यों हो कबीर...

पंडा और काजी की साजिशों के बीच
वर्णमाला से हट गये हैं ढाई आख़र
ये हद थी... अब चुप्पी तोड़ो...
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !

रविवार, सितंबर 28, 2008

हम तो हनुमान हैं......!

सतयुग में राम के हर काज को संवारने वाले हनुमान के बारे में तो सभी जानते हैं... लेकिन कलियुग में भी ऐसे कई लोग हैं... जो हनुमान बन जाते हैं... इन हनुमानों के गुण अपने राम के लिए समर्पण में छुपे हैं... फर्क बस इतना है कि त्रेता के हनुमान एक ही राम के लिए समर्पित रहे... और कलियुग के हनुमान को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मर्यादा पुरुषोत्तम कौन है... जिसका राज्याभिषेक हुआ... वही उनका राम है... और वे उसके हनुमान... जब तक कुर्सी है... तो चरण सेवक हनुमान हैं... और वनवास हुआ तो गद्दी पर बैठने वाला उनका नया राम है... कलियुग के ये हनुमान सत्ता संभालने वाले हर राम के प्रिय हैं... उसके चहेते हैं... और तारीफ से लेकर तरक्की तक के हकदार हैं... ऐसे हनुमान हर वक्त गद्दीनशीन राम की सेवा में हैं... उसकी जी-हुजूरी के लिए तैयार है... और सत्ता जाने के बाद उसकी खाल खींचने में भी माहिर हैं... ज़रा गौर से देखिये... क्या दिख रहा है कोई कलियुगी हनुमान आपके आस-पास?

शनिवार, सितंबर 13, 2008

बहुत मासूम होते हैं शब्द
जब इन्हें लिखा जाता है ब्लैकबोर्ड पर
नोटबुक तक आते-आते...
इनके साथ ही उतर आता है शातिरपन
अजीब बात है...
जब शहर की दीवारों पर लिखे जाते हैं यही शब्द...
तो कितने भयानक हो जाते हैं...... !