भीड़ से बचने की चाहत लिये
अपनी अलग दुनिया
बस गई है सपने में...
हर रात उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और सुबह तक गुदगुदाता है
सब-कुछ सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब-कुछ रौंदते हुए
और
नींद के साथ टूट जाता है
मेरा सपना भी...!

सपने ही तो है जहॉ कुछ अपना है,
जवाब देंहटाएंइन सपनों के साथ ही खत्म हो जाती है जिन्दगी,
खुशकिस्मत है जिन्हे नसीब होती है ये हक़ीकत भी....