खिड़की से सटे पलंग पर
मुँह बनाये लेटा है भाई...
परदे के पार
चूल्हे से जूझ रही है बहन...
घुटनों पर तेल मल रही है
बीमार माँ...
और माथे पर हाथ धरे
गहरी सोच में डूबे हैं पिता...
सबके पास अपनी परेशानियाँ हैं
अपने दुःख हैं...
और
अपना दुःख सबसे बड़ा होने की खीज भी
एक-दूसरे से लगभग अबोला है सबका
अजीब बात है -
दुःख भी साझे नहीं रहे
सुखों की तरह...
मेरे बारे में
- नीरज श्रीवास्तव
- लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
- अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.
सोमवार, सितंबर 29, 2008
संवेदनाएँ... !
मृत देहों के चिथड़े
बिलखते हुए नवजात
और खून से सनकर
पहचान खो चुकी लाशें
यही सब दिखता है
समाचार की सुर्खियों में
मन करता है... चस्पा कर दूँ
एक सूचना भी...
कि यह सिर्फ विज्ञापन है
प्रायोजित संवेदनाओं का...!
बिलखते हुए नवजात
और खून से सनकर
पहचान खो चुकी लाशें
यही सब दिखता है
समाचार की सुर्खियों में
मन करता है... चस्पा कर दूँ
एक सूचना भी...
कि यह सिर्फ विज्ञापन है
प्रायोजित संवेदनाओं का...!
पहचान !
आज कविता नहीं
कहानी सुनाता हूँ तुम्हें...
ये कहानी है
हम जैसे एक आदमी की
जो ईसाई नहीं था
क्योंकि तब इस देश में ये धर्म नहीं था
वो सिख भी नहीं था
क्योंकि तब ये धर्म जन्मा नहीं था
और
हिंदू या मुसलमान होना
उसे पसंद नहीं था
मज़हब के आइने से दुनिया देखने वालों
सोचकर बताओ ज़रा
इस आदमी की पहचान कैसे होगी...?
कहानी सुनाता हूँ तुम्हें...
ये कहानी है
हम जैसे एक आदमी की
जो ईसाई नहीं था
क्योंकि तब इस देश में ये धर्म नहीं था
वो सिख भी नहीं था
क्योंकि तब ये धर्म जन्मा नहीं था
और
हिंदू या मुसलमान होना
उसे पसंद नहीं था
मज़हब के आइने से दुनिया देखने वालों
सोचकर बताओ ज़रा
इस आदमी की पहचान कैसे होगी...?
मेरा सपना !
भीड़ से बचने की चाहत लिये
अपनी अलग दुनिया
बस गई है सपने में...
हर रात उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और सुबह तक गुदगुदाता है
सब-कुछ सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब-कुछ रौंदते हुए
और
नींद के साथ टूट जाता है
मेरा सपना भी...!
अपनी अलग दुनिया
बस गई है सपने में...
हर रात उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और सुबह तक गुदगुदाता है
सब-कुछ सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब-कुछ रौंदते हुए
और
नींद के साथ टूट जाता है
मेरा सपना भी...!
बोलो कबीर !
एक अरसे से नहीं सुनी
आवाज़ तुम्हारी
आख़िर चुप क्यों हो कबीर...
मंदिर के घड़ियालों और
मुल्ला की अज़ानों के बीच
कहाँ खो गई है आवाज़ तुम्हारी
चुप क्यों हो कबीर...
एक-दूसरे से लड़ बैठे हैं
राम और रहीम
जख़्मों के बीच
सुबक रहा है एकेश्वर
चुप क्यों हो कबीर...
पंडा और काजी की साजिशों के बीच
वर्णमाला से हट गये हैं ढाई आख़र
ये हद थी... अब चुप्पी तोड़ो...
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !
आवाज़ तुम्हारी
आख़िर चुप क्यों हो कबीर...
मंदिर के घड़ियालों और
मुल्ला की अज़ानों के बीच
कहाँ खो गई है आवाज़ तुम्हारी
चुप क्यों हो कबीर...
एक-दूसरे से लड़ बैठे हैं
राम और रहीम
जख़्मों के बीच
सुबक रहा है एकेश्वर
चुप क्यों हो कबीर...
पंडा और काजी की साजिशों के बीच
वर्णमाला से हट गये हैं ढाई आख़र
ये हद थी... अब चुप्पी तोड़ो...
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !
रविवार, सितंबर 28, 2008
हम तो हनुमान हैं......!
सतयुग में राम के हर काज को संवारने वाले हनुमान के बारे में तो सभी जानते हैं... लेकिन कलियुग में भी ऐसे कई लोग हैं... जो हनुमान बन जाते हैं... इन हनुमानों के गुण अपने राम के लिए समर्पण में छुपे हैं... फर्क बस इतना है कि त्रेता के हनुमान एक ही राम के लिए समर्पित रहे... और कलियुग के हनुमान को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मर्यादा पुरुषोत्तम कौन है... जिसका राज्याभिषेक हुआ... वही उनका राम है... और वे उसके हनुमान... जब तक कुर्सी है... तो चरण सेवक हनुमान हैं... और वनवास हुआ तो गद्दी पर बैठने वाला उनका नया राम है... कलियुग के ये हनुमान सत्ता संभालने वाले हर राम के प्रिय हैं... उसके चहेते हैं... और तारीफ से लेकर तरक्की तक के हकदार हैं... ऐसे हनुमान हर वक्त गद्दीनशीन राम की सेवा में हैं... उसकी जी-हुजूरी के लिए तैयार है... और सत्ता जाने के बाद उसकी खाल खींचने में भी माहिर हैं... ज़रा गौर से देखिये... क्या दिख रहा है कोई कलियुगी हनुमान आपके आस-पास?
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