आज कविता नहीं
कहानी सुनाता हूँ तुम्हें...
ये कहानी है
हम जैसे एक आदमी की
जो ईसाई नहीं था
क्योंकि तब इस देश में ये धर्म नहीं था
वो सिख भी नहीं था
क्योंकि तब ये धर्म जन्मा नहीं था
और
हिंदू या मुसलमान होना
उसे पसंद नहीं था
मज़हब के आइने से दुनिया देखने वालों
सोचकर बताओ ज़रा
इस आदमी की पहचान कैसे होगी...?

शायद उसे जरुरत नहीं पहचान की ..........
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