बचपन से पढ़ते आये हैं...
खुशी बाँटने से बढ़ती है...
फ़िर जाने क्यों...
लोग छुपाना चाहते हैं अपनी ख़ुशियाँ...
शायद नहीं जानते लोग...
छुपाई नहीं जा सकती खुशी भी...
ग़म की तरह...
मेरे बारे में
- नीरज श्रीवास्तव
- लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
- अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.
गुरुवार, नवंबर 25, 2010
रविवार, नवंबर 21, 2010
बदल गई किताबें
अरसे बाद किताबों से यारी की है...
हैरान हूँ...
न परियाँ हैं... न भोले किरदार
जाने कहाँ से घुस आये हैं
भारी-भरकम शब्द
जिनका अर्थ जानने के लिए
उनसे भी भारी किताब का सहारा लेना पड़ता है
सोचता हूँ
अगर बचपन में पढ़नी होती ऐसी किताबें
तो शायद हँसने-रोने की
परिभाषा ही बदल जाती...
हैरान हूँ...
न परियाँ हैं... न भोले किरदार
जाने कहाँ से घुस आये हैं
भारी-भरकम शब्द
जिनका अर्थ जानने के लिए
उनसे भी भारी किताब का सहारा लेना पड़ता है
सोचता हूँ
अगर बचपन में पढ़नी होती ऐसी किताबें
तो शायद हँसने-रोने की
परिभाषा ही बदल जाती...
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