अरसे बाद किताबों से यारी की है...
हैरान हूँ...
न परियाँ हैं... न भोले किरदार
जाने कहाँ से घुस आये हैं
भारी-भरकम शब्द
जिनका अर्थ जानने के लिए
उनसे भी भारी किताब का सहारा लेना पड़ता है
सोचता हूँ
अगर बचपन में पढ़नी होती ऐसी किताबें
तो शायद हँसने-रोने की
परिभाषा ही बदल जाती...

हमें किताबो से प्यार है क्योंकी वो हमारे सच्चे दोस्त हैं
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