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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

रविवार, अक्टूबर 24, 2010

बड़े होने की बड़ी तमन्ना थी..

तकनीक के इस ज़माने में कविताएँ भी मोबाइल के इनबॉक्स तक पहुँचने लगी हैं... एक दोस्त ने मैसेज के ज़रिये भेजी ये ख़ूबसूरत कविता... सोचा आपसे भी बाँट लूँ...

जब छोटे थे
तो
बड़े होने की बड़ी तमन्ना थी...
लेकिन
अब पता चला...
कि अधूरे अहसास
और...
टूटे सपने से बेहतर
अधूरा होमवर्क
और
टूटे खिलौने थे...

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