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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

गुरुवार, अगस्त 20, 2009

भोजन से पहले मंत्र ज़रूरी....!

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को मंत्र पढ़ने के बाद ही मिलेगा खाना... ऐसा इसलिये, क्योंकि राज्य सरकार ने प्रदेश भर के सरकारी स्कूलों में बँटने वाले मिड डे मील से पहले भोजन बच्चों से भोजन मंत्र का पाठ कराने के आदेश दिये हैं... सरकार का आदेश लागू हो पाता... इससे पहले ही स्कूलों में मंत्रोच्चारण की खिलाफत शुरु हो गई... विवाद पर चर्चा से पहले एक नज़र उस मंत्र पर, जिसे सरकार बच्चों से पढ़ाना चाहती है -
"अन्न ग्रहण करने से पहले विचार मन में करना है
किस हेतु से इस शरीर का रक्षण, पोषण करना है
हे परमेश्वर एक प्रार्थना नित्य तुम्हारे चरणों में
लग जाए तन-मन-धन मेरा मातृभूमि की सेवा में"
यह भोजन मंत्र मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में सितम्बर से शुरू हो जाएगा, इसके लिए शिक्षकों को विशेषज्ञ प्रशिक्षण देंगे... सूबे की भाजपा सरकार का स्कूलों में नई परम्पराएं शुरू करने का यह दूसरा बड़ा फैसला है, इससे पहले स्कूलों में सूर्य नमस्कार की शुरूआत हो चुकी है... भोजन से पहले मंत्र योजना लागू करने वाले स्कूल शिक्षा विभाग की मुखिया का तर्क है कि इसमें ईश्वर के प्रति धन्यवाद का भाव है, जिसने हमें अन्न दिया है... मंत्र में ये कामना भी की गई है कि अन्न खाकर और ज्ञान अर्जित कर हम इस योग्य बनें कि देश के काम आ सकें... इसके साथ ही यह मंत्र हिन्दी में है और समझने में आसान है... लेकिन मुस्लिम समुदाय के धर्मगुरुओं का कहना है कि सरकारी आदेश मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों के खिलाफ है... मुसलमान भोजन से पहले बिसमिल्लाह की चर्चा करते हैं इसलिए ऐसे भोजन मंत्र का कोई औचित्य नहीं है... अब बात कुछ सवालों पर... जो भोजन मंत्र पर उठे विवाद के बीच गुम हो गये हैं... भोजन करने से पहले ईश्वर को याद करने की परंपरा हर धर्म और समुदाय में रही है, लेकिन जब यही काम भाजपा सरकार करती है और एक प्रार्थना को मन्त्र का रूप दिया जाता है, तो बवाल शुरु हो जाता है... दरअसल धर्म और समुदाय में ही नहीं, तमाम मंहगे निजी स्कूलों में भी सालों से भोजन मंत्र किसी न किसी रूप में मौजूद है... लेकिन अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाने वालों ने कभी इस पर आपत्ति जताने की हिम्मत नहीं दिखाई... लेकिन जब राज्य सरकार ने सरकारी स्कूलों को भोजन मंत्र की परिधि में लाने का ऐलान किया, बस तभी से कुछ लोग झंडा उठाकर आगे आने को बेताब हो गये हैं... अरे भई, अगर हिम्मत है, तो पहले अपने बच्चों के निजी स्कूल में जाकर मॉर्निंग प्रेयर से लेकर फैंसी ड्रैस तक एक भी चीज की खिलाफत करके दिखाएँ... अगले दिन बच्चे की टीसी हाथ में आ जायेगी...
एक सवाल भोजन मंत्र लागू करने वाली राज्य सरकार से भी है, क्या सिर्फ भोजन मंत्र पढ़वा देने भर से मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता सुधर जायेगी... या फिर मिड डे मील में अक्सर निकलने वाले मेंढक, छिपकली और कीड़ों से निजात मिल जायेगी... ज़रूरत इस बात की है कि अगर भोजन से पहले मंत्र पढ़ाया जा रहा है, तो भोजन भी उतना ही शुद्द रखा जाये... उम्मीद की जाती है मन की शुचिता का दावा करने वाली सरकार को भोजन की शुद्दता का भी खयाल रहेगा...!

मंगलवार, अगस्त 04, 2009

मीडिया और मंदी - 2

धराशायी होते सदियों पुराने औद्योगिक घराने... सिमटती नौकरियाँ... बढ़ती बेरोज़गारी.... और ऐसा ही बहुत कुछ अख़बार के पन्नों और टेलीविज़न की स्क्रीन से हर दिन झाँकता दिखाई देता है... हर दिन बाज़ार के आँकड़े ये दिखाने के लिए चले आते हैं... कि हमारी-आपकी मुस्करहाट पर भी नज़र आना चाहिए मंदी का ग्रहण... लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि लगातार डराने वाली आर्थिक मंदी ने कुछ धन्नासेठों को मनमानी करने की छूट भी दे दी है... और इसका शिकार बने मंदी की खबर फाइल करने वाले ख़बरची... मंदी के बहाने मीडिया घरानों के मैनेजमैंट गुरुओं ने पुराने और मंझे हुए पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया... तो ऊँची पगार वाले मैनेजिंग पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह बचाये रखने के लिए छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया... कहीं पगार में कटौती हुई... कहीं ज़रूरी खर्चों के लिए तरसाया गया... तो कहीं ये तक कहा गया कि अपनी तनख्वाह खुद निकालो... ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या दर्जनों में है, जहाँ महीनों से पत्रकारों को तनख्वाह नहीं मिली है... कुछ दलाल किस्म के जर्नलिस्ट को छोड़ दें... तो कलम और कैमरे के ज़रिये सच को सामने लाने वाले पत्रकारों की मुश्किल ये है कि ज़िंदगी भर में कमाया हुनर, एक झटके में बेकार साबित होने के बाद यकीन करें भी तो किस पर... ऊपर से बेचारगी देखिये कि हर नाइंसाफी के खिलाफ ताल ठोंकने वाले पत्रकार अपना दुःख बयान तक नहीं कर सकते... खुलकर बगावत करने की तो छोड़िये... अपनी ही बिरादरी में भी हालात छिपाने को मजबूर हैं... ये कड़वी हकीकत आपके सामने इसलिये... ताकि किसी पत्रकार से सामना होने पर ये खयाल रहे कि बेहद बुरे वक्त का पूरे जीवट से सामना करता आदमी... आपकी दया का नहीं, बल्कि ज्यादा सम्मान का हकदार है....!