मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

मंगलवार, अगस्त 04, 2009

मीडिया और मंदी - 2

धराशायी होते सदियों पुराने औद्योगिक घराने... सिमटती नौकरियाँ... बढ़ती बेरोज़गारी.... और ऐसा ही बहुत कुछ अख़बार के पन्नों और टेलीविज़न की स्क्रीन से हर दिन झाँकता दिखाई देता है... हर दिन बाज़ार के आँकड़े ये दिखाने के लिए चले आते हैं... कि हमारी-आपकी मुस्करहाट पर भी नज़र आना चाहिए मंदी का ग्रहण... लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि लगातार डराने वाली आर्थिक मंदी ने कुछ धन्नासेठों को मनमानी करने की छूट भी दे दी है... और इसका शिकार बने मंदी की खबर फाइल करने वाले ख़बरची... मंदी के बहाने मीडिया घरानों के मैनेजमैंट गुरुओं ने पुराने और मंझे हुए पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया... तो ऊँची पगार वाले मैनेजिंग पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह बचाये रखने के लिए छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया... कहीं पगार में कटौती हुई... कहीं ज़रूरी खर्चों के लिए तरसाया गया... तो कहीं ये तक कहा गया कि अपनी तनख्वाह खुद निकालो... ऐसे मीडिया संस्थानों की संख्या दर्जनों में है, जहाँ महीनों से पत्रकारों को तनख्वाह नहीं मिली है... कुछ दलाल किस्म के जर्नलिस्ट को छोड़ दें... तो कलम और कैमरे के ज़रिये सच को सामने लाने वाले पत्रकारों की मुश्किल ये है कि ज़िंदगी भर में कमाया हुनर, एक झटके में बेकार साबित होने के बाद यकीन करें भी तो किस पर... ऊपर से बेचारगी देखिये कि हर नाइंसाफी के खिलाफ ताल ठोंकने वाले पत्रकार अपना दुःख बयान तक नहीं कर सकते... खुलकर बगावत करने की तो छोड़िये... अपनी ही बिरादरी में भी हालात छिपाने को मजबूर हैं... ये कड़वी हकीकत आपके सामने इसलिये... ताकि किसी पत्रकार से सामना होने पर ये खयाल रहे कि बेहद बुरे वक्त का पूरे जीवट से सामना करता आदमी... आपकी दया का नहीं, बल्कि ज्यादा सम्मान का हकदार है....!

1 टिप्पणी:

  1. नीरज,वाकई क्या बेचारगी है...दुनिया भर की नाइंसाफी के खिलाफ अपनी कलम से लड़ते हैं पत्रकार...लेकिन मंदी की मार में बिगड़े अपने हालात बयाँ नहीं कर पाते...उम्मीद की लौ मध्दम सही लेकिन बुझी नहीं..देखना,फिरेंगे कलमकार के भी दिन..

    जवाब देंहटाएं