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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

सोमवार, सितंबर 29, 2008

बोलो कबीर !

एक अरसे से नहीं सुनी
आवाज़ तुम्हारी
आख़िर चुप क्यों हो कबीर...

मंदिर के घड़ियालों और
मुल्ला की अज़ानों के बीच
कहाँ खो गई है आवाज़ तुम्हारी
चुप क्यों हो कबीर...

एक-दूसरे से लड़ बैठे हैं
राम और रहीम
जख़्मों के बीच
सुबक रहा है एकेश्वर
चुप क्यों हो कबीर...

पंडा और काजी की साजिशों के बीच
वर्णमाला से हट गये हैं ढाई आख़र
ये हद थी... अब चुप्पी तोड़ो...
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !
कुछ बोलो कबीर !

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