खिड़की से सटे पलंग पर
मुँह बनाये लेटा है भाई...
परदे के पार
चूल्हे से जूझ रही है बहन...
घुटनों पर तेल मल रही है
बीमार माँ...
और माथे पर हाथ धरे
गहरी सोच में डूबे हैं पिता...
सबके पास अपनी परेशानियाँ हैं
अपने दुःख हैं...
और
अपना दुःख सबसे बड़ा होने की खीज भी
एक-दूसरे से लगभग अबोला है सबका
अजीब बात है -
दुःख भी साझे नहीं रहे
सुखों की तरह...

नीरज सच कहूँ रुलाई आ गई तुम्हारी इस कविता के सुनते पढ़ते...शब्द पढ़े तो हमेशा से जाते हैं..तुम्हारे शब्द तस्वीर खींचते हैं...नीरज ऐसी ही तस्वीरी नज़्मे खींचते रहो....
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