मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

सोमवार, सितंबर 29, 2008

घर... !

खिड़की से सटे पलंग पर
मुँह बनाये लेटा है भाई...
परदे के पार
चूल्हे से जूझ रही है बहन...
घुटनों पर तेल मल रही है
बीमार माँ...
और माथे पर हाथ धरे
गहरी सोच में डूबे हैं पिता...

सबके पास अपनी परेशानियाँ हैं
अपने दुःख हैं...
और
अपना दुःख सबसे बड़ा होने की खीज भी

एक-दूसरे से लगभग अबोला है सबका
अजीब बात है -
दुःख भी साझे नहीं रहे
सुखों की तरह...

1 टिप्पणी:

  1. नीरज सच कहूँ रुलाई आ गई तुम्हारी इस कविता के सुनते पढ़ते...शब्द पढ़े तो हमेशा से जाते हैं..तुम्हारे शब्द तस्वीर खींचते हैं...नीरज ऐसी ही तस्वीरी नज़्मे खींचते रहो....

    जवाब देंहटाएं