दोपहर के दो से चार बजे के बीचघर की दहलीज पर
बैठी हैं दो महिलाएं...
थाली में पड़े चावल बीने जा रहे हैं
और साथ चल रही हैं बातें
सुख-दुःख की...
रोज़ की सब्ज़ी से लेकर
त्यौहार के व्यंजन तक
और
घर की बातों से लेकर
मंदिर के प्रवचन तक
सारे विषय उतर आते हैं
उनकी बातों में...
इनके दुःख साझे हैं
सुख भी साझे हैं
और साझा है
सपनों का संसार
कितने ख़ास हैं
दहलीज के सरोकार....

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