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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

गुरुवार, नवंबर 13, 2008

दहलीज़

दोपहर के दो से चार बजे के बीच
घर की दहलीज पर
बैठी हैं दो महिलाएं...
थाली में पड़े चावल बीने जा रहे हैं
और साथ चल रही हैं बातें
सुख-दुःख की...

रोज़ की सब्ज़ी से लेकर
त्यौहार के व्यंजन तक
और
घर की बातों से लेकर
मंदिर के प्रवचन तक
सारे विषय उतर आते हैं
उनकी बातों में...

इनके दुःख साझे हैं
सुख भी साझे हैं
और साझा है
सपनों का संसार
कितने ख़ास हैं
दहलीज के सरोकार....

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