एक बार फिर दहली मुंबई... इस बार दहशतगर्दों का निशाना बनी ताज की वो इमारत... जिसका सेहन एक सदी से भी ज्यादा वक्त से दुनिया के सैलानियों को लुभाता रहा... लेकिन इस बार मौत ने उनकी मेजबानी की... सैकड़ों ज़िंदगियाँ लाशों में बदलीं... और बाकी को बचाने में जाँबाज काम आये... जाने वाले चले गये... लेकिन मौत के मंज़र को खेल बनाकर जिस तरह पर्दे पर पेश किया गया... वो भी धमाकों से कम ख़तरनाक नहीं था... इसमें भी जाने कितने पिताओं का दिल बैठा होगा... जाने कितनी माताओं का कलेजा मुँह को आया होगा... चाहरदीवारी के भीतर तक आतंक परोसने वालों को अपना गुनाह नज़र आता हो या नहीं... लेकिन खौफ़ के ये सौदागर अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते... एक दिन उन्हें जवाब देना होगा... और ये जवाब सफाई से नहीं साफगोई से दिया जाना चाहिए...

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