मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

सोमवार, दिसंबर 28, 2009

जाने किसकी नज़्म है ये... पर बेहद ख़ूबसूरत है....

मुझको मेरे ही खेत में धरती उतार दे
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे

पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे

तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे

खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...

हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...

1 टिप्पणी:

  1. खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
    चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...

    -जिसने भी रचा, बहुत उम्दा रचा!

    जवाब देंहटाएं