मुझको मेरे ही खेत में धरती उतार दे
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे
पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे
तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे
खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...
हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...
मैं धान बोऊँ और तू पानी उतार दे
पानी बढ़ गया है छतें भी अब हैं ज़मीन
छज्जे पर धूप की कोई कश्ती उतार दे
तू अपने घर में बिखरी हुई खुशबुएँ पहन
अब ये लिबास-ए-खानाबदोशी उतार दे
खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
चिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...
हैदराबाद में रहते हुए एक अनाम से रिश्ते में किसी ने कागज़ पर पैंसिल से लिखी ये लाइनें मेरे हाथ में दी थीं... रिश्ते की तरह कागज़ भी गुम हो चुका है... लेकिन यादों में हर अक्षर ताजा है... अब आपसे बाँट रहा हूँ अपनी यादें...

खिड़की पर आऊँ तो भीतर भी आ सकूँ
जवाब देंहटाएंचिड़िया ये कह रही है जाली उतार दे...
-जिसने भी रचा, बहुत उम्दा रचा!