महिला दिवस पर दुनिया की आधी आबादी की बेहतरी के दावों की गूँज सुनाई देती रही, लेकिन जब भारत की संसद में महिला आरक्षण बिल पेश करने की बारी आई, तो दोनों ही सदनों में बिल के समर्थक और विरोधियों का कुछ और ही रंग देखने को मिला. आखिरकार पिछले एक दशक से भी ज्यादा वक्त से लंबित बिल पास नहीं हो सका और महिला दिवस पर महिलाओं को राजनीति में उचित भागीदारी देने की उम्मीद एक बार फिर धरी रह गई. महिलाओं को उनका हक देने की मुहिम को सिर्फ संसद में ही झटका नहीं लगा, बल्कि सच तो ये है कि दुनिया की आधी आबादी अपने हक के लिए हर दिन जूझती है. पिता के घर भाईयों के बराबर सुविधा के लिए तरसती आँखें हो, पति के घर खुद को शरीर से ज़्यादा समझे जाने का अरमान हो, दफ्तर में पुरुष सहकर्मियों से कमतर आँके जाने का दर्द हो या सरे बाज़ार मनचलों की फब्तियों से बचने की कोशिश... हर जगह अपने अस्तित्व को साबित करने की चुनौती से रोजाना जूझती है स्त्री.
भारतीय पुरुष प्रधान समाज अपने बर्ताव के पक्ष में रानी लक्ष्मीबाई से लेकर इंदिरा गांधी तक का उदाहरण दे सकता है, लेकिन ये भी उतना ही सच है कि सैकड़ों साल से जाने कितनी मुन्नियाँ, गुड्डियाँ अपनी ज़िंदगी शुरु करने से पहले ही मौत के मुँह में ढकेली जाती रही हैं और जो लड़कियाँ बच भी जाती हैं, उन्हें किसी की बेटी, बहन, पत्नी या माँ की पहचान के साथ ही ज़िंदगी गुजारनी पड़ती है. कुछ अपवादों को छोड़कर भारतीय समाज के संपन्न परिवारों में भी स्त्रियों की परवरिश जिस अंदाज़ में की जाती है, उसकी परिणिति यही है. महिलाओं के हालात बयान करती ये लाइनें जब लिखी थीं, तो मन में यही टीस थी ऐसे हालात कि दुनिया की आधी आबादी की कोई मुकम्मल पहचान आखिर कैसे मिल पायेगी...
पिता, भाई, बेटा या पति
सिर्फ नाते बदले
नियति नहीं
तुम आश्रित थीं, आश्रित ही रहीं
कभी सहयोग, कभी सुरक्षा के नाम पर...
तुमने बाँटा निर्मल स्नेह
सबने चाही केवल देह
तुम शोषित थीं, शोषित ही रहीं
कभी जिम्मेदारी, कभी विवशता के नाम पर...
सबने छला है तुम्हें
हर दिन-हर पल
पर तुम्हें शिकायत नहीं
शायद स्वीकार लिया है तुमने इस छल को
हमेशा की तरह
कभी नियति, कभी महानता के नाम पर...!
पिता, भाई, बेटा या पति
सिर्फ नाते बदले
नियति नहीं
तुम आश्रित थीं, आश्रित ही रहीं
कभी सहयोग, कभी सुरक्षा के नाम पर...
तुमने बाँटा निर्मल स्नेह
सबने चाही केवल देह
तुम शोषित थीं, शोषित ही रहीं
कभी जिम्मेदारी, कभी विवशता के नाम पर...
सबने छला है तुम्हें
हर दिन-हर पल
पर तुम्हें शिकायत नहीं
शायद स्वीकार लिया है तुमने इस छल को
हमेशा की तरह
कभी नियति, कभी महानता के नाम पर...!
पुरुषों के आधिपत्य वाले समाज के लिए डूब मरने की बात ये भी है कि नज़र न आने वाले मानसिक अत्याचार ने आम महिला के मन में संघर्ष के जज़्बे को जैसे मार दिया है. क्या आधी आबादी को इस हाल में पहुँचाने वाले पुरुष को ही ये ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी जानी चाहिए कि वो नारी का सम्मान वापस लौटाने की पहल करे. न सिर्फ पहल करे, बल्कि उसके परिणाम आना भी सुनिश्चित करे. उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे सांसद ये सुन रहे होंगे और महिला आरक्षण बिल पर अगली बहस के वक्त नज़ारा बदला हुआ होगा.


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