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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

शनिवार, जनवरी 10, 2009

नदी


पुल से गुज़रते हुए अक्सर सोचता हूँ
नदी के पास भी होती होंगी यादें
अपनी यादों में सहेजती होगी
हरे मैदानों का संग
पनघट की अल्हड़ गाथाएँ
कभी सुनाती होगी बैचेन किनारों को
पत्थरों के शालिग्राम बनने की कथा
जब कभी याद आते होंगे
हमारे हाथों दिये ज़ख्म
तो कराह के साथ निकल पड़ते होंगे आँसू
सोचता हूँ...
कहीं इन आसुँओं का नाम ही तो नहीं... नदी

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