अपने स्कूल के दिनों में कभी-कभी रूमानी हो जाता था... कई बार तो दोस्तों के किस्से भी काफी होते थे... उदास कर जाने के लिए... सालों पहले की रूमानियत बाँट रहा हूँ अब....
तुम्हारे साथ बिताया
हर लम्हा
ठहर जाता है मेरे पास
सौगात की तरह...
तन्हाई में घिर जाता है
मेरा वजूद
तुम्हारी यादों से...
और
काया और मन देर तक झूमते हैं
स्मृति की तरंगों पर...
रोज़ ही चलता है
ये सिलसिला
तुम्हारे आने से पहले
और
तुम्हारे चले जाने के बाद...

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