दिन भर
ईंट-गारे के बोझ तले
दबी चिंताएँ
अचानक मुखर हो उठती हैं
अंधेरे में...
अंधेरे में ही बचाती है माँ
अपने हिस्से की रोटी
सुबह के नाश्ते के लिए...
अंधेरी में ही माँगते हैं लाचार पिता
माँ की चूड़ियाँ
बेटे की फीस के लिए...
अंधेरे में ही
दुआ माँगती है बहन
भाई की नौकरी के लिए...
और अंधेरे में ही माँगता है भाई
ईश्वर से एक रिश्ता
अपनी बहन के लिए...
अजीब... लेकिन सच...
ज़रूरी है अंधेरा
रिश्तों की गर्माहट के लिए...!

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