जैसा कि पहले लिख चुका हूँ - ये अनगढ़ सी लाइनें उस वक्त की हैं, जब स्कूल में पढ़ा करता था... कस्बे में रहते हुए सामाजिक बंधनों को न स्वीकारते हुए भी मानना पड़ता है... बस उसी दौरान जो लगा... उतार दिया कागज़ पर... अरसे बाद वो पुर्ज़ा हाथ आया... तो पुराना वक्त याद आ गया...
अक्सर अपने घर के अंदर
मैं मिलता हूँ मज़बूरी से
जब चाहता हूँ तुमसे
मिलना पल भर के लिए
तब अचानक अनपेक्षित से लगते हैं
घर के सारे लोग
और मैं छिपते-छिपाते
तुम्हें देखकर ही संतुष्ट हो जाता हूँ
हर बार सोचता हूँ
कि तुम्हें बुला लूँगा अपने पास हमेशा के लिए
पर तुमसे एक ही मुलाकात
भुला देती है सारी मुश्किलें
जब तक कि मैं फिर से मज़बूर नहीं होता
और
समझौता नहीं करता मज़बूरी से...!

jab tak ki mae phir se majboor nahi hota...aur samjhota nahi karta majburi se.....bahoot khoob niraj babu....shifalee
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