भीड़ से
बचने की चाहत लिए
सपने में बस गई है
अपनी अलग दुनिया
हर रात
उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और
गुदगुदाता है सुबह तक
सब कुछ
सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब कुछ रौंदते हुए
और नींद के साथ
टूट जाता है
मेरा सपना भी...!

खूबसूरत यथार्थ अभिव्यक्ित
जवाब देंहटाएंवाह नीरज,
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया। लिखते रहो।
अख़लाक़