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लंदन (यूके) - हैदराबाद, भोपाल (भारत), मध्य प्रदेश, India
अपनी ज़िंदगी को लेकर सपने नहीं देखता... या यूँ कहें कि देखना बंद कर दिया... अपने आस-पास की तमाम चीजों के लिए संजीदा हूँ... इसलिए ख़रा और कभी-कभी कड़वा बोलता हूँ... जो दोस्त हैं कड़वाहट पचा जाते हैं, नहीं तो नये दुश्मन खड़े हो जाते हैं.

शनिवार, जनवरी 23, 2010

सपना...

भीड़ से
बचने की चाहत लिए
सपने में बस गई है
अपनी अलग दुनिया
हर रात
उतरता है सपना
बिस्तर के सिराहने
और
गुदगुदाता है सुबह तक
सब कुछ
सुहाना होने के अहसास से
अगली सुबह
फिर घुस आती है भीड़
अपनी गति से
सब कुछ रौंदते हुए
और नींद के साथ
टूट जाता है
मेरा सपना भी...!

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